Monday, 30 October 2017

मेरी पहली कहनी फ़ालिज आपके सामने

फ़ालिज
नाम - सत्य प्रकाश
गुजरात केन्द्रीय विश्वविद्यालय
 मोबाईल- 8690048641
बस का सफ़र इतना कष्टदाई होता है पहले पता चल जाता तो शायद कई दोस्तों की तरह मैं भी कंप्यूटर डिप्लोमा करके क्लर्क या किसी दफ्तर में काम करने लग जाता | ज्यादा नहीं तो चाचा की तरह किसी एल. आई. सी. दफ्तर का एजेंट तो बन ही जाता | यह भी नहीं होता तो अपनी फोन रिचार्ज की दूकान या रेलवे टिकट निकालने की दूकान खोल लेता |
पर किसे पता था कि कॉलेज जाने में बस में भी पसीने छूटेंगे | द्वारका मोड़ आ चूका था भीड़ भरी बस में मैं आगे आने की कोशिश करते हुए आगे आया और दरवाजे पर लटके हुए लोगों को उतरने का बोलते हुए बस से उतरने की कोशिश करने लगा | भीड़ इतनी थी कि निकलने की जगह नहीं थी | बस का रूट लंबा था और सरकारी बसें कम थी | मेरे पास कॉलेज का बस पास था जिससे सरकारी बस में फ्री-फ्री कहीं भी घूम सकता था किन्तु सरकारी बस का घंटों इंतजार करना पड़ता | प्राइवेट बस में टिकट और ऊपर से जाट कंडक्टरों की मनमानी युवा दिल को लड़ने को उतारू कर देती | कई बार बस में हाथा-पाई भी हुई और गाली गलौज तो आम बात थी |यह केवल पुरूषों के साथ ही नहीं था महिलाओं के साथ तो वे छेड़ छाड़ तक करते थे | तू-तू, मैं-मैं तो रोज की थी और उनसे आप जीत भी नहीं सकते क्योंकि उन्होंने तू-तू मै-मै के सिवा सिखा ही क्या था? खैर भीड़ में बस से तो उतरने में मैं कामयाब हुआ |
पसीने और सफोकेशन से भरी बस के बाद खुली हवा शरीर को गर्मी में ठंडक दे रही थी |
असली लड़ाई अब भी बाकी थी | दो किलोमीटर पैदल नाले की उडती धूल में चलकर घर जाने की | साधन थे नहीं और थे भी तो बीस रुपये से कम में कोई जायेगा नहीं | और रोज रोज का आना जाना चालीस रुपये ऐसे ही हो जाते | फिर यदि यही पैसे बचते तो कॉलेज की कैंटिन में खाने के काम आते या दोस्तों के साथ टशन मारने के | मैं दोस्तों के साथ टशन तो छोड़ नहीं सकता था क्योंकि इज्जत का सवाल था | किन्तु पैदल जा सकता था | पैदल जाना मुझे उर्जा देता और संघर्ष की प्रेरणा देता किन्तु थकान भी देता |
मैं रोज की तरह पैदल ही चलता चला जा रहा था.. कान में फोन की लीड लगा के और हरियाणा का नया-नया गाना मुझे अच्छा लगने कागा था ‘ओ हट जा ताऊ पाच्छे ने......नाच्हन दे जी भर के ने.....’ गाना चलता और मैं भी चलता | गाना रुकता मै दुबारा शुरू करता | गाना दुबारा चलता मै भी चल देता | इतने में किसी मोटर साईकिल के सिटी की आवाज सुनाई देने लगी | मैंने सिटी की ओर देखा उनका चेहरा हेलमेट में बंधा था | धूल और धुंध में साफ़ तो नहीं दिखा किन्तु आवाज जानी पहचानी लगी | उन्होंने बोला मोनू बैठ जाओ | मैं टपाक से उनकी हीरो होंडा पर बैठ गया | जब मैंने पहचाना तो पाया कि भैया मेरी गली के ही थे | नाम था राजा | शरीर से भी राजा थे..... दिमाग से भी राजा थे.... और परिवार से भी राजा थे और गली में भी राजा ही थे |
शरीर से राजा इसलिए क्योंकि लम्बे कद-काठी और चौड़ी छाती गोरा रंग चेहरे पर लाली लम्बे और घने बाल में शरीर आकर्षक और रोबदार लगता स्वभाव से बिलकुल ही उल्टे थे | बहुत ही मुलायम |
दिमाग से इसलिए कि आठ घंटे कॉलसेंटर में काम करने के बाद भी इतने फ्रेस, खुश और हंसी मिज़ाजी व्यक्ति शायद ही मिले |
परिवार से भी राजा क्योंकि भाभी बहुत खुबसूरत थी उनके ओठ का रंग हल्का गुलाबी, आँखे बड़ी बड़ी, चेहरा गोरा और गोल | उनके बाल घुटनों तक आते थे गली की लड़कियां उनसे अक्सर पूंछती की भाभी आपके बाल इतने लम्बे कैसे हुए? उनकी सुन्दरता को लेकर कई प्रश्न करतीं | उमर उनकी कोई सत्ताईस वर्ष होगी और राजा भैया की पच्चीस होगी |
गली में राजा इसलिए कि सबसे बड़ा माकन गली में उनका | सबसे ज्यादा प्रेमी, खुशमिजाज और अपनत्व वाले | हमारे तो खास करके क्योंकि मेरे पिता और उनके पिता उम्र में लगभग एक से और सिद्धांतो पर चलने वाले | मेरे घर से उनका घर लगभग पाँच छः मकान छोड़ कर था | पिता जी रोज सुबह हौद का पानी निकलते थे या गमलों में पानी देते थे | पिता जी जब काम करते नजर आते, तो राजा भैया के पिता जी चाय पीने को आवाज देकर बुला लेते और दोनों देश दुनिया की बातें करते.. खूब गप्पे लगाते |
कभी-कभी गप्पे लम्बे समय तक चलते | पिता जी इसी गप्पे में काम पर जाना तक भूल जाते |
गर्मियों के दिन थे बिजली अधिक समय तक गायब ही रहती | हमारे मोहल्ले से इसलिए भी गायब रहती क्योंकि अभी कच्ची थी | ऊपर से दलितों का मोहल्ला था इसलिए भी सरकारी अफसर ये समझते कि यहाँ बिजली का क्या काम है? कोई पढ़ता लिखता होगा नहीं | यहाँ तक कि मोहल्ले से कोई बिजली विभाग में अर्जी तक देने नहीं जाता और जाता भी कैसे सभी दलित थे | अपनी रोजी-रोटी रोज कमाते और रोज पेट भरते |
मोहल्ले में कई दिन तो लड़ाइयाँ भी अधिक होती | एक बार की बात है मैं पड़ोस की सीता आंटी से पूछ बैठा “आंटी जी अंकल रात को क्यों लड़ रे थे?”
वे मेरी बात को सुनते ही तुरन्त जवाब देने लगीं जैसे यह घटना आम हो “आज मालिक ने पैसे नहीं दिए फिर वो पी कर आए थे | उनका गुस्सा मुझ पर उतारते |” उनका जवाब होता |
घर की परेशानी को कहाँ नहीं होती “लड़की पेन्सिल बाक्स के लिए जिद कर री थी..| उसे मारने लगे और फिर मुझ पर चिल्लाने लगे, ‘कि उसे समझा नहीं सकती?” पेन्सिल बाक्स को उन्होंने जिसे ‘जमेट्री बाक्स’ कहा था |
इसी तरह लड़ाई रोज लड़ी जाती | युद्ध जीते जाते | हर रोज इतिहास लिखा जाता, हर रोज तख़्त और ताज नए होते.....| तलवारें नयी होती.....| मोहरे नए होते | पैंदे नए होते......वजीर नए होते....| राजा नए होते....|  रानी नयी होती....| किन्तु दारू वही होती..... गाली वही होती......| रात वही होती.....| असमान वही होता.......| बदलते तो केवल घर और मारने के तौर तरीके | फिर भी रोज काम पर जाना नहीं छुटता | दारू का नशा जब टूटता तो सारे गम भी छू मंतर हो जाते |
दलितों का मोहल्ले में हमेश कीचड़ होता था | सरकार ने अभी सीवर लाईन भी नहीं दलवाई थी | घर के नहाने धोने का पानी हौद में इकठ्ठा होता फिर सभी रोज सुबह नहाने से पहले हौद खाली करते थे | मोहल्ले के सभी आदमी-औरत शौच को बाहर नाले पर ही जाते |
मकान लेते वक्त हमें इस बात की खबर तक नहीं थी कि यह दलितों का मोहल्ला है | कच्ची कालोनी कटी थी | शुरू-शुरू में ही हमने मकान के लिए जमीन खरीद ली थी | शुरू में इस मोहल्ले का नाम कारण भी नहीं हुआ था, क्योंकि यह तब खेत हुआ करते थे | इसमें गेंहू और बाजरे की खेती होती | मुझे इसलिए भी यह सब पता है क्योंकि जब पिता जी जमीन का सौदा करने वाले थे.., तो मुझे जमीन को दिखाया था | मोहल्ले का नाम बाद में रखा गया ‘दास गार्डन’ |
कई दिनों तक तो नौकरी के फारम भरते हुए अपने घर का पता लिखते वक्त मुझे बहुत अच्छा लगता | एक दिन दूध लेने के लिए पंडित जी की दूकान पर गया तो वह पूछने लगे ‘आपकी गली में कल कौन लड़ रहा था |’
मैंने तुरंत जवाब दिया महेंद्र अंकल कल पी कर आए थे..., तो किराये दार से भीड़ गए | असल में दोनों पिए हुए थे | इतने में उनके मुह से निकला “चमार हैं न यह सब रात को जब तक नहीं लड़ते उनकी रोटी नहीं पचती |”
अभी उनकी बात चल ही रही थी उनके भाई जिनकी बगल में ही ज्योतिष की दूकान थी... बात को और संजीदा और रस लेते हुए बोले.. “ये दास गार्डन है | सारे दास यहीं बस गए हैं |” “इसलिए ही इसका नाम ‘दास गार्डन’ रखा गया |”
मैंने दूध लिया और चलता बना | किन्तु दुकानदार की यह बात मुझे खटक गयी | दास को लेकर मेरे दिमाग में अंग्रेज के समय के दास और उससे भी पहले के किताबों में पढ़े हुए दास-दासी और सेवक सभी याद हो आये | मैं जब जाति गत आधार पर गली में बने लोगों के मकान गिनने लगा तो हमारी गली में एक ब्राह्मण का, एक वैश्य और एक मुस्लिम को छोड़ के सभी घर दलितों के पाया | उस वैश्य के घर का मालिक मेरे पिता जी थे | यह अचम्भे की बात हो सकती थी लेकिन हमारा पहले से पड़ोसियों से इतना मेल मिलाप हो गया था कि जाति को न पिता जी महत्त्व देते न मैं |
दलितों से हमारा कोई खास बैर नहीं था | क्योंकि थे तो हमारे पड़ोसी और सामाजिक विज्ञान की पुस्तक में मैंने कहीं पढ़ा था कि पड़ोसी ही पड़ोसी के काम आता है | यह प्रत्यक्ष भी था एक बार की बात थी | मुझे अपना जाति प्रमाण पत्र बनवाना था | मोहल्ले में हम नए थे तब मुझे दो पड़ोसियों के विटनेस और उनके पहचान पत्र की प्रतिलिपि चहिये थी | मैंने जैसे गली में बात बताई पड़ोसियों ने तुरन्त मेरी मदद की | इसके बाद से हम और भी मिल जुल कर रहते | लड़ने वाले आपस में लड़ते भी किन्तु हमसे न किसी का बैर था न ही हम शराब को पीते | शराब न पीने से गली में प्रतिष्ठा भी मिलती |
राजा भैया के परिवार में तीन लोग थे भाभी, भैया और भैया के पापा | उनके पापा का नाम हरीश गौतम था | गली में अधिकतर लोग अपने नाम के पीछे गौतम टाइटल ही लगाते थे | गौतम वे नाम के अंत में इसलिए लगाते क्योंकि जाति से चमार थे | यदि चमार नाम के आगे लगाया होतो तो लोग उनको अपने घरों में काम भी नहीं देंगे | शुरू-शुरू में काम मिल भी जाता था क्योंकि अधिकतर दलित नाली साफ़ करने और झाड़ू लगाने का कम करते...| किन्तु अब धीरे-धीरे पांचवीं आठवीं पढ़ने वाले चौकीदारी, रंगाई पुताई, नलके गाड़ने, ईट ढ़ोने, पार्कों में घास काटने, गाड़ी धोने और ढोल बजाने जैसे काम करते | उनमे डर बराबर बना रहता है यदि कोई जान लेगा तो अपने घरों में रंगाई और पुताई तक नहीं करने देंगे |
हरीश गौतम पहले दिल्ली जल बोर्ड में चतुर्थ श्रेणी के कर्मचारी नियुक्त थे | किन्तु उन्हें रिटायर्ड हुए भी सात साल हो चुके थे | रिटायर्ड के समय मिले पैसे से उन्होंने मकान खरीद लिया था और नौकरी में रहते हुए राजा भैया को बी.ए तक की शिक्षा करायी थी | वैसे उनका एक बड़ा लड़का भी था ..पढाई में उसने दिलचस्पी नहीं दिखाई | दसवीं पढ़ के छोड़ दिया | दूसरा कारण माँ का न होना भी था | माँ न होने के कारण पिता ने घर की देखभाल के लिए बड़े बेटे की जल्दी शादी कर दी .....| बाद में उसने अपना अलग घर बसा लिया |
अब छोटे बेटे के साथ हरीश गौतम रहते हैं | वे अक्सर बताते थे चतुर्थ श्रेणी के कर्मचारी और जाति से दलित होने के नाते उन्हें अक्सर डांट मिलती | नयी-नयी नौकरी थी | इस डांट का असर उनकी जिंदगी पर भी पड़ने लगा था वे अधिक शराब पीने लगे थे | एक दिन काम से लौटकर पत्नी से लड़ाई झगड़ा किया जिस पर पत्नी ने जहर खा लिया | पत्नी की मृत्यु के बाद भी उनका फस्ट्रेशन ख़त्म नहीं हुआ वे कभी बच्चे को गुस्से में मारते | कभी पड़ोसी पर इस फस्ट्रेशन को उतारते | इसी तरह वे अपना जीवन अकेले काटते चले आये | बड़े लड़के के अलग रहने पर खाना राजा और हरीश ही बनाते | इस परेशानी को दूर करने के लिए हरीश सोचने लगा था |
बी.ए पास होने के बाद छोटे लड़के राजा गौतम की शादी के लिए रिश्ते आने लगे | हरीश गौतम की सरकारी नौकरी होने के नाते और लड़का बी. ए पढ़े होने के वजय से अच्छे और पढ़ी- लिखी लड़की के रिश्ते भी आने लगे | हरीश गौतम को सरकारी नौकरी का घमण्ड भी था | वह दहेज़ में वे एक आना कम नहीं लेना चाहता था | इस खोज में कई रिश्ते आये और बात नहीं बनी |
इसी बीच दिल्ली के महरौली निवासी ब्रिजदास गौतम तीन लाख नगद और अपनी इकलौती लड़की को देने के लिए तैयार हो गए | हरीश गौतम ने आव देखा न ताव चट शादी के लिए तैयार हो गया | वह उम्र में लड़के से डेढ़ दो वर्ष बड़ी थी किन्तु राजा को वह पसंद भी आ गयी थी | जबकि हरीश गौतम को लड़की की उम्र खटकी थी | राजा को वह हम उम्र ही लगती थी |
राजा को लड़की पसंद आने का एक कारण और भी था | लड़की ने आई. टी. आई. किया था.. | वह महिलाओं के कपड़े सिलने में निपुण थी | लड़की का नाम सुमन था | सुमन के पिता चार भाई थे और वह सबसे बड़े भाई की इकलौती लड़की थी | शादी धूम-धाम से हुई | डबल बेड, गद्दे, सोफे, ड्रेसिंग टेबल, फ्रिज, टीवी, गैस, चूल्हा और खूब सारे शादी में चढ़ावे के बर्तन देख हरीश की छाती छप्पन इंच से चौहत्तर होती जा रही थी |
शादी के बाद सब कुछ अच्छा चलता रहा | सुमन के साल भर के भीतर ही पैर भी भारी हो गए किन्तु राजा अभी बाप नहीं बनना चाहता था | वह अभी जीवन में बहुत साड़ी कामयाबी हासिल करना चाहता था | खुद का कॉलसेंटर डालना चाहता था |
उसने पिता को बिना बताये बच्चे को गिरना उचित समझा | एक दिन वह अस्पताल गया और बच्चा गिरवा दिया | बच्चा गिराने के बाद वह तो चैन से जीने लगा किन्तु सुमन की हालत भीतर ही भीतर ख़राब होती चली गयी | गर्भपात के बाद उनके जनानान्गों से धीरे धीरे खून बहना शुरू हुआ.. और वह रुकने का नाम ही नहीं लिया | शुरूआत में राजा ने सोचा कुछ दिनों या हफ़्तों में ठीक हो जायेगा किन्तु छोटी मोटी दवाओं से समाधान नहीं हुआ | समस्या अधिक बढ़ जाने पर उसे अस्पताल में भर्ती कराया जहाँ डॉक्टर द्वारा उसकी हालत गंभीर बताई गयी | इस बीमारी में बहुत सारे पैसे लगे यहाँ तक कि घर का आधा हिस्सा बेचना पड़ा | तब जाकर सुमन की जान बची |
जमीन बेचने के दुख से हरीश भीतर ही भीतर और कुढ़ने लगा | बहु के वापस आने के बाद धीरे धीरे हरीश का क्रोध बढ़ता गया | हरीश को एक तो जमीन बेचे जाने का गम और दूसरी बहु की उम्र ज्यादा होने की पीड़ा नासूर होने लगी थी | कभी दाल और सब्जी को लेकर शाम को बेटे को शिकायत करता..., तो कभी मसाले को लेकर | राजा इस तरह के व्यवहार को लेकर पिता और पत्नी दोनों को समझाता |
इस तरह दिन, सप्ताह, महीने कब पाँच साल में बदल गए पता ही नहीं चला | हरीश की आदत अभी पहले जैसी ही बनी हुई थी... कभी घर में सफाई को लेकर शोर शराबा करता कभी खाने को लेकर तंज कसता | अब स्थिति और भी दयनीय और अलग हो चुकी थी | सुमन हरीश की रोज की शिकायत को सहते-सहते थक चुकी थी | हरीश धीरे-धीरे बहु को उम्र अधिक होने के कारण ताने कसने लगा......, बाद में घर बेचे जाने को लेकर रोज रोज बोलता.... एक दिन तो उसने उसे बाँझ तक बोल दिया | इस बात से सुमन अन्दर ही अन्दर हिल गयी |
राजा पढ़ा लिखा होने के साथ-साथ जिम्मेदारियों को समझता भी था | उसने जो गलती कुछ साल पहले की थी उसे लेकर आज भी चिंतित और दुखी था | घर बिकने और पत्नी के इलाज के बाद घर की स्थिति कुछ अधिक बेहतर नहीं हुई थी | न ही उसका कोलसेंटर खोलने का सपना साकार हुआ था | भीतर ही भीतर अब वह पिता बनाने का ख्वाब जरूर देखने लगा था | कुछ समय बाद सुमन दुबारा गर्भवती हुई | राजा बहुत प्रसन्न था | रोज समय से घर आता | रास्ते से आम, केले, अनार और भी कई प्रकार फल और खाने के समान वह घर ले आता |
हरीश भी पोते आने की ख़ुशी में घर में हरी सब्जियां, दूध, नमक-तेल का बराबर ध्यान रखता | हरीश की रंजिश पेड़ के सूखे पत्तों की तरह गिर रही थी |
जिस दिन का इन्तजार था हरीश को वह दिन भी धीरे धीरे नजदीक आ गया | एक दिन सुबह-सुबह सुमन को पेट में दर्द शुरू हुआ | राजा ने तुरंत गाड़ी किया और पड़ोस के सरकारी अस्पताल में ले गया | बहुत मसक्कत और ऑपरेशन के बाद राजा को लड़की हुई | राजा बहुत खुश था किन्तु हरीश उस रात अपने घर न आकर बड़े बेटे के घर चला गया और पन्द्रह सोलह दिन बाद जब राजा लेने गया तब आया | इस बीच अपनी पेंशन के पैसे को बड़े बेटे को दे चूका था | राजा की कॉलसेंटर में दस हजार पगार थी | फिर भी उसने इधर-उधर से पैसे का इंतजाम करके पत्नी की दवाइयां और घर का सामान लाता रहा | पत्नी की देख-रेख के लिए राजा ने काम से छुट्टी के ली थी | एक सप्ताह की छुट्टी समाप्त हो चुकी थी वह काम पर जाने लगा था |
हरीश पहले की तरह खुन्नस खाता और बहु को रोज अपशब्द कहता | बेटे को अक्सर सलाह देता कि “बहु को छोड़ दे’, तेरे ते जा की उमर ज्यादो है |”
“अभी तेरी उमर ही.. का हुई है? दूसरी कर दुन्गौ तेरी शादी”
“जा ते सुन्दर और बढ़िया लड़की ढूंढौगौ तेरे काजे”
राजा ने बात नहीं मानी | हरीश ने अब घर की लड़ाई पड़ोसी को बतानी शुरू कर दी | पड़ोसी से..., दूसरे पड़ोसी...., फिर तीसरे... और फिर पूरी गली में बात फैलती गई | फिर दो गलियों में... फिर चार गलियों में बात की बात, बात में बात, बात के ऊपर बात... किन्तु कोई बात के नीचे की बात नहीं करना चाहता | बात पूरब पश्चिम की हवा की तरह नहीं बल्कि चौराई हवा की तरह बढ़ रही थी | बात चक्रवृद्धि ब्याज की तरह बढ़ती चली जा रही थी | बात अरावली पर्वत श्रेणी की तरह लम्बी और चौड़ी होती चली जाती | कोई बात पर पानी लगाता..., तो कोई नमक लगाता..., कोई हल्दी लगाता...., तो कोई मसाला | बात में मिर्च जब लगी जब बड़ी बहु का घर में हस्तेक्षेप होने लगा |
बड़ी बहु के भीतर ससुर की पेंशन और जमीन की लालच जग गयी थी | आए दिन चली आती और हरीश को सुमन के खिलाफ भड़काती | एक दिन तो हरीश ने मेरे पिता जी को बुलाया | गली में पिता जी का ठीक-ठाक रूतबा और सम्मान था | पिता जी जब पहुंचे तो हरीश घर के रसोई से दाल का कुकर लेकर बाहर आया और सबको दिखाने लगा | दाल पतली थी | पिता जी को तो ठीक लगी क्योंकि कि पतली दाल... केवल हरीश के घर की ही कहानी नहीं थी | मोहल्ले के लगभग सभी घरों की कहानी थी | पिता जी ने हरीश को समझाया | वह बार बार बोलता
“जे कोऊ खामन लायक दाल हे” | “रोज रोज जेई तरह खानों बनत है म्हारे घर में”
आज जब बात अधिक जोर पकड़ी तो सुमन भी बाहर आ गयी | उसने भी घर की सारी छुपी बातों को सबके सामने रख दिया | सुमन बोल रही थी...
“बताओ अंकल जी जितनी दाल घर में होगी उतनी ही तो बनाऊगी” सुमन अब तक घर की सच्चाई को बहार नहीं आने देना चाहती थी किन्तु आज वह सब कुछ सामने रख देना चाहती है | वह बोलते जा रही थी... “रोज रोज राजा को मुझे छोड़ने की सलाह देता है |”
“कभी बोलता है इसके ऑपरेशन के बाद अब बच्चा नहीं होगा.... कभी बोलता है इसकी उम्र ज्यादा है |” सुमन का रौद्र रूप आज गली वालों ने देखा | उसने अपने भीतर की सभी जमी हुई जड़ों को आज उखाड़ फेकना जरुरी समझा... “दान दहेज लेते वक्त इसकी हेकड़ी क्यों नहीं खुली | ...उस समय क्या मर गया था | मेरे घर वालों ने जब पैसे दिए तभी क्यों नहीं बोला उस समय तो पैसे दिख रे थे इसको |”
बहु ने आज जो सच वर्षों से दबा हुआ था, उसे सबके सामने कर दिया | जिसकी हरीश को कभी आस नहीं थी | हरीश अपने को ढकने लगा | सुमन ने आज उसकी सारी प्रतिष्ठा को चूल्हे में झोंक दिया था | शाम को जैसे ही राजा ने घर में प्रवेश किया हरीश रोने लगा | रो-रो के सारी बात राजा को बताई | राजा ने पिता के आँखों के आँसू में सच्चाई दिखी और सुमन से पूछने लगा फिर क्या था सुमन ने भी बोल दिया..“मैं क्या करती जितनी दाल होगी उसी को तो बनाऊंगी”
“सब्जी खाएँगे नहीं.. उसमे मसाला है”
राजा ने आव देखा न ताव सुमन को दो-चार थप्पड़ जड़ दिया | सुमन ने इस बात की खबर फोन से अपने घर वालो को दी | उसके दो भाई, पिता और चाचा सभी अगले दिन उसके घर पर थे | तमाम प्रकार के सुलह के बाद वे सभी अपने घर गए | राजा ने बात बिगडती देख, अपनी गलती को स्वीकार कर लिया |
करता भी क्यों नहीं ख़ुशी उसकी बेटी धीरे-धीरे एक साल की हो रही थी | चलने लगी थी | बोलने लगी थी माँ-बाप की तरह गोरा रंग और सुन्दर चेहरा था ख़ुशी का | वह भी खुश मिजाज घर में खेलती | मेरी गोदी कम ही आती | शायद इसका कारण यह हो सकता है एक बार ख़ुशी मेरी गोदी में थी | गाय आई और मैं उसे गाय की पीठ पर बैठने लगा... गाय ने अपनी चमड़ी को हिलाया, ख़ुशी डर गई | जिसके बाद वह अक्सर मेरी गोद में नहीं आती | आती भी तो टॉफी के बहाने | शाम को पिता जी आते तो ख़ुशी-ख़ुशी करते उसके घर तक चले जाते | वह पिता जी से अधिक घुलमिल गयी थी |
राजा दिन पर दिन घर के कलेश से नाराज रहता | नौकरी में भी उसे अधिक पैसे नहीं मिलते थे यही कोई दस बारह हजार | किन्तु इतने में घर का खर्च किसी तरह चल जाता | हरीश पेंशन का सारा पैसा बड़ी बहु और बेटे को देने लगा था | महीने के हर एक तारीख से दो दिन पहले बड़े लड़के के घर चला जाता और चार पाँच तारीख में पैसे ख़तम कर के वापस आता | हरीश सुमन की पिटाई वाले घटना से कुछ दिन तो भीगी बिल्ली बना रहा.., किन्तु फिर शेर के अवतार में आने लगा था |
सुमन भी शान्त नहीं थी | राजा एक दिन काम से वापस आया तो पाया कि कुकर जमीन पर पटका हुआ है | पिता जी ने कमरे में अन्दर से कुण्डी लगा रखा है | उसने सुमन से घटना के बारे में जायज़ा लिया सुमन ने बताया “डॉक्टर ने उन्हें सब्जी खाने को मना कर रखा है | मैंने दाल को जीरे और लहसुन से तड़क दिया | जिसे देख वह भड़क गए और कुकर फेंक दिये |”
राजा ने इस रात फिर सुमन को मारा | इस बात की खबर मुझे तब लगी जब मैं अपने दरवाजे पर सुबह ग्यारह बारह बजे के बीच बैठा दोस्तों को फोन से एस. एम. एस. पर बातें कर रहा था | घंटो इसी प्रकार हमारी बातें होती | गर्मियों का समय था भाभी ने मुझे बाहर बैठा देखा तो पास आ गयीं | बाहर बने थडे पर बैठ गयी | मैंने उनके चेहरे की ओर देखा और दंग रह गया | पिछली दीपावली पर सुमन भाभी के चेहरे को देख मैं पहचान नहीं पाया था कि यह कौन हैं | शादी के लहंगे में बिंदी, सिंदूर और नंगे पाँव मेरे घर दीपावली के खील बत्तासे और उसमे एक बर्फी लेकर आयीं थी | वह हमारे घर के प्रति अधिक आस्था रखतीं थी | आस्था इसलिए क्योंकि मोहल्ले में एक हमारा घर या कहें कि अधूरा घर ही था, जहाँ लड़ाई नहीं होती | गलती के कारण मैं पिता जी से पिट लेता और अगले दिन सब एक जैसा |
आस्था का दूसरा कारण प्रसाद में बर्फी थी | गली के सभी लोग अधिकतर छोटे-मोटे काम-धंधे करते दीपावली पर मालिक इनाम में लड्डू या सस्ती मिठाई रसगुल्ले का डब्बा और एक जोड़ी कपड़े दे देते | सभी अधिकतर प्रसाद में आधा लड्डू देते या एक छोटा रसगुल्ला दे जाते | इसी प्रकार जिसके घर से जैसा प्रसाद आया होता मैं भी उसी तरह का पंहुचा देता | अधिकतर प्रसाद में जो आता उसे ही वापस करता | भाभी इस दिन बर्फी लायी..., इसका एक कारण यह भी हो सकता है, मैं उनके घर पहले ही बर्फी का प्रसाद दे आया था |
खैर दोपहर के समय जब भाभी आई मैंने उडती-उडती नजर उनके चहरे पर दौड़ाई तो देखा उनके बाएँ आँख के नीचे नीला पड़ा था और गर्दन पर नाख़ून के निशान थे, जो अभी भी लाल थे | आँखों के नीचे नीला रंग देख.... मैं जहाँ तक समझ पा रहा था तेज थप्पड़ से हुए होंगे | जिसके कारण उनके गाल भी हल्के सूझे हुए से लग रहे थे | किन्तु गले के घाव विचलित करते | कहीं राजा भैया गला दबाने की कोशिश तो नहीं कर रहे थे और भाभी अपने को बचाने के लिए छुड़ा रही हों | घाव कैसे भी लगे थे किन्तु दोनों के बीच के प्रेम को समाप्त कर चुके थे | शादी का बंधन और बेटी ख़ुशी की ख़ुशी ही कारण होगी जिससे वे साथ में एक छत के नीचे गुजर-बसर कर रहे थे |
भाभी ने उस दिन अपने बचपन से लेकर बड़े होने तक की सारी बातें मुझे बतायीं जिसमें सबसे ज्यादा वह अपने घर में लाडली होने का जिक्र करतीं | माँ और भाइयों की शरारत को तो बार बार बताती, मैं किसी की बातों को इतने गौर से सुनने का आदि नहीं होना चाहता था उनमे मुझे उब महसूस होती थी | मैं न ही सुमन भाभी की बातों को इतने चाव से सुनना चाहता था | किन्तु वे थी की अपनी बातों को बड़ी ही रोचक ढंग से सामने रखती | उन्हें बार बार लगता मोनू भैया ने यह बात शायद नहीं सुनी | क्योंकि उनकी बातों को अनसुना करने के क्रम में कभी कभी मैं जहाँ अपनी संवेदना और निष्ठा प्रकट करनी होती, वहां अपनी हाँ हूँ नहीं करके उल जलूल बातों पर हामी भरता |
मेरे दोस्तों के बार बार मैसेज आ रहे थे | मैंने अपने फोन को बगल में जरूर रख दिया था किन्तु मुझे लगता कि मैंने अपने आप को भी फोन के साथ साथ कही बगल में ही रख दिया है | वहां होते हुए भी मैं वहां नहीं था |
भाभी इतनी बातें बताये जा रही थी | बाते करती भी क्यों नहीं अपने घर इकलौती और लाडली लड़की जो थी | दूसरे उनकी बातों में उनके दोस्तों का जिक्र आता | इन बातों में राजा और हरीश गायब होते | जिक्र आता भी तो हरीश के लिए बुड्ढा शब्द आता और राजा के लिए अक्सर कहती.... “मोनू भैया तुम्हारे भैया पहले ठीक थे किन्तु बुड्ढे ने उनके भीतर भी नफरत भर दी है |” कह कर वह दूसरी बहुत सारी बातें मुझसे आज ही कह लेना चाहती थी | कभी वह दहेज़ की बात करती...तो कभी अपने जेवरों की, कभी बर्तनों की | मैं बातों में इंटरेस्ट न होते हुए भी पूछ बैठा... “भाभी यह आँखों के नीचे चोट कैसे लगी |”
इस बात को पूछते ही उनके आँखों में आँसू भर आये | पूरी आँखे डबडबा गयीं | उनके होट थरथराने लगे | चेहरा पहले से और लाल होने लगा | ऐसा भी लगा जैसे वह कितनी देर से इस इंतजार में हों कि कब मोनू भैया इस घाव के बारे में मुझसे पूछें | वह एक रात पहले के उस पूरी घटना को मेरे सामने रख देना चाहतीं थी | वह अपनी सच्चाई को मेरे सामने रखना चाहती थी | या राजा के द्वारा अपनी ही पत्नी का गला दबाने से शायद वह आहत थी | जो भी हो सब कुछ सिलसिले वार तरीके से मेरे सामने रखना चाहती थी | या यह भी हो सकता उन्हें गला दबाए जाने से मृत्यु बोध हुआ हो | या उन्हें डर हो कहीं अगली घटना में राजा उनकी जान न लेले इसी वजह से अपनी उस रात की घटना को उन्होंने बताया | उन्होंने ही कुकर पटकने वाली बात को बताया | और यह भी बताया की कल की रात तुम्हारे भैया ने मेरे पेट पर भी लात मरी थी|
पेट के घाव बाहर वह नहीं दिखा सकती थी | शायद जिसके कारण उन्होंने बात को कहकर ही इसका जिक्र किया, किन्तु उन्होंने एक बात और मेरे सामने रख दी “अगर मेरे बच्चे को कुछ हो गया न तो मेरे घर वाले इसको जिन्दा नहीं छोड़ेंगे” कहते ही उनकी आँखें फिर डबडबा गयीं |
साडी के कोने से उन्होंने अपनी आँख पोछी | और फिर धिरे-धीरे ही उन्होंने सारी बात खत्म कर दी और अब उठ कर जाने लगी | उनकी सारी बातें भी मेरे पास से जाने लगी | उनकी कहानी भी उनके साथ जाने लगी | मेरे सामने से वह दूर जाने लगी.. मैं भी अब अन्दर जाने लगा | उनकी संवेदना और उनके प्रति निष्ठां भी अब जाने लगी | मेरे दोस्तों के मैसेज आने लगे | मैं उनमें खोने लगा | किन्तु एक बात मुझे केवल याद रही राजा भैया फिर से पिता बनने वाले हैं |
इस बीच मैं बी. ए पास करके एम. ए. करने लगा | नजफगढ़ से उत्तम नगर की सड़क खुदी हुई थी... भीड़ के कारण घंटो मुझे बस में लग जाते | मैंने आजादपुर रहने का फैसला किया | एक दिन पिता जी का तडके सुबह ही फोन आया कि “बेटा.... राजा ने फांसी लगा ली” पिता जी के इस बात से मैं अन्दर से हिल गया |
मैं अचंभित था | राजा यह कैसे कर सकता है? किन्तु राजा ने यह कर लिया था उसने इस दुनिया से अपना नाम कटवा लिया था | नाम उसने और भी जगह से कटवा लिए थे सुमन की देह से...., अपना नाम कटवा किया था | गली से अपना नाम कटवा लिया था | अपनी नौकरी से नाम कटवा लिया था और भी न जाने कितने रजिस्टरों से अपने नाम को हमेशा के लिए कटवा दिए थे |
पिता जी ने यह भी बताया कि “कल रविवार था राजा घर पे ही था | अपने छोटे वाले लड़के को हॉस्पिटल में दिखाने गया था | आया सब ठीक था सुबह सुबह लड़ रहा था किसी चीज को लेकर बहु भी बाहर थडे पर बैठी थी | बुड्ढा बोले जा रहा था कुछ न कुछ | वह उठा और घर के अन्दर गया... दरवाजे में कुण्डी लगा ली | सुमन तो सोच रही थी कि गुस्से में गए होंगे | अभी आ जायेंगे थोड़ी देर में | लेकिन काफी देर बाद जब दरवाजे को उसने पिटा तो दरवाजा नहीं खुला | वो रोने लगी | मैं और गली के वीरदास, प्रेम, लालू गए तो हमने भी दरवाजे को पिटा | अन्दर से नहीं खोला | सुमन रोने लगी तेज तेज “बुड्ढे ने मेरे पति को मार दिया”,.... “बुड्ढे ने मेरे पति को मार दिया”
पिता जी की बाते मुझे सुनाने में बहुत रुचिकर लग रहीं थी वे बोले जा रहे थे “फिर हमने पुलिस को फोन किया उन्होंने दरवाजा तुडवाया तो देखा | राजा साड़ी के सहारे पंखे से लटका हुआ था |” पापा की आँखों में पानी आया होगा शायद सिसकियों सी आवाज मुझे भी सुनाई दी थी | साथ ही साथ मेरी आँखे भी भीग रहीं थी |
पिता जी भोजपुरी में बोलने लगे “देखबा देहियाँ एकदम वौसा ही था | लेकिन जमीनिया पे पिसाब रहल और कच्छवा में ही टट्टी हो गईल रहल |” वह बोलते बोलते रुक से गए फिर बोलने लगे “अभी पुलिस लाश को पोस्मार्टम को ले गयी है|” उनकी नजर आब मुझ पर थी वे बोल रहे थे कि “देखो जुग जबाना बहुत ख़राब है” संभल कर रहा करो |
अब मैंने उनकी बात में ज्यादा धयान न देकर अपनी मौज मस्ती को छोड़..., राजा उसके दोनों बच्चों के बारे में सोचने लगा | दो तीन दिन बाद पिता जी ने फिर बताया “देखो गली बहुत सुनी सुनी लग रही है”.... “अब यहाँ रहने का मन नहीं करता है”..... “कुछ पैसे होते तो मकान बेचकर कहीं और ले लेते”
मैंने पिता जी से किसी तरह यह पूछने की हिम्मत की “भाभी कहाँ हैं?”
पिता जी ने तुरंत बोला “वो यहाँ रह के क्या करती बुड्ढे से लड़ती?”
“सुमन एकदम से रोये जा रही थी उसके घर वाले आए थे दोनों बच्चों और उसको साथ में ही ले गए” पिता जी की इस बात में संवेदना झलक रही थी “देखो ख़ुशी भी एक दम रोए जा रही थी... पापा ..पापा चिल्ला रही थी हम लोग चुप कराते ...| वह मानती ही नहीं थी|”
पिता जी की बात समाप्त होने के बाद मैंने अन्दर ही अन्दर सोचा.... लगता है भाभी उस दिन यही सब मुझसे कहना चाहती थीं | वह बताना चाहती थी बुड्ढा मेरे दूसरे बच्चे को लेकर खुश नहीं है | वह बताना चाहती हों शायद एक लड़की को लेकर बुड्ढे ने इतना बवाल किया तो दूसरी लड़की हो गयी तो क्या होगा, वह भी ऑपरेशन से | शायद वह यह भी बताना चाहती हों बुड्ढा सोच रहा होगा ओपरेशन में खर्चा लगेगा ... फिर बचा-कूचा घर भी बिक जायेगा |
बहुत दिनों के बाद पिता ने बताया कि “उसने कोई केस भी नहीं किया..., नहीं तो घर उसके बच्चों के नाम हो जाता |” पिता जी की बात खत्म होने के बाद मैं सोचने लगा, वह अब उस घर में भी रह के क्या करती जब उनका अपना छोड़ के चला गया |
कुछ दिनों के बाद पिता ने बताया कि “बुड्ढा मर गया” मैंने राहत की सांस ली | पिता जी बोले जा रहे थे कि “सोया था कब मरा... गली में किसी को पता ही नहीं चला | तीन चार दिन जब लोगों को बुड्ढा नहीं दिखा तो शक गया और गली में बदबू भी आ रही थी...., किसी चीज के सड़ने की | तो लोगों का ध्यान उसके घर की ओर गया | दरवाजा अन्दर से बंद था बुड्ढा सोते-सोते ही मर गया था | बदबू इतनी थी मैं तो देखने भी नहीं गया |...”


नाम - सत्य प्रकाश
गुजरात केन्द्रीय विश्वविद्यालय

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