नाम-सत्य प्रकाश
शोधार्थी-पीएच.डी.
गुजरात केन्द्रीय विश्वविद्यालय
satyaprakashrla@gmail.com
नई इबारत लिखता हंस का दलित विशेषांक-द्वितीय
सोपान
प्रेमचंद ने जब ‘हंस’ पत्रिका निकालने का निश्चय
किया होगा तो उनके सामने सबसे बड़ी चुनौती मजलूमों के हक़ की बात करना रहा होगा। जिसकी
शुरूआती रचनाओं को अंग्रेजी हुकूमत ने प्रतिबंधित कर दिया हो उससे बेहतर समाज को
समझने वाला दृष्टा नहीं हो सकता। प्रेमचंद भली भाँती समझते थे कि यथार्थ के धरातल
पर खड़े होकर समाज को आदर्शोन्मुख कैसे किया जाय? हंस प्रेमचंद, जैनेन्द्र, शिवरानी
देवी और अमृतराय से होता हुआ 1986 में कथाकार राजेन्द्र यादव के पास पहुंचा। इस
लम्बी यात्रा के दौरान हंस हमेशा हंस ही रहा। राजेन्द्र यादव ने अपने प्रथम
सम्पादकीय में हंस के सन्दर्भ में कहा था ‘हंस प्रेमचंद की रूढ़ियों से नहीं,
परंपरा से प्रतिबद्ध है।’ प्रेमचंद की परंपरा से उनका आशय था “सामाजिक असमानता,
अन्याय और शोषण के विरुद्ध संघर्ष, रूढ़ियों और आडंबरों के खिलाफ जिहाद, शक्ति और
सत्ता की अनीतियों, अत्याचारों का प्रतिरोध-यही चिंताएँ और प्रतिबद्धताएँ प्रेमचंद
की भी थीं-अपने समय के संदर्भ में।” आजादी पूर्व का समय रहा हो या आजादी के बाद का
हंस ने हमेशा सत्ता, शोषण और अन्याय का प्रतिकार किया है। इसके प्रतिरोध की आवाज लगातार
ती
व्र और तीक्ष्ण होती गयी है। बहरहाल हंस पत्रिका के दलित विशेषांक नवंबर 2019 की ताजगी को देखना और परखना एक पाठक की दृष्टि से अति आवश्यक है। अजय नावरिया के संपादकीय में हंस का नवंबर 2019 अंक दलित साहित्य ‘द्वितीय सोपान’ खंड-1 और खंड-2 आया। हंस दलित साहित्य ‘प्रथम सोपान’ 2004 में श्यौराज सिंह बेचैन के संपादकत्व में आया। दीर्घ अंतराल के पश्चात आये इस अंक की चर्चा साहित्य जगत में बहस का मुद्दा बनी हुई है और हो भी क्यों न? सदियों से शिक्षा के नाम पर जिनके कान में सीसे पिघलाकर डाले गये, समानता के नाम पर जिनके गले में मटकी और पीठ पर झाड़ू बाँध दी गयी हो, अधिकार के नाम पर जिन्हें केवल मैला ढ़ोने और जूठन से पेट भरने पर मजबूर किया गया, वह अपने अधिकारों को लेकर प्रतिरोध नहीं करेगा तो उसकी लड़ाई कौन लडेगा?
व्र और तीक्ष्ण होती गयी है। बहरहाल हंस पत्रिका के दलित विशेषांक नवंबर 2019 की ताजगी को देखना और परखना एक पाठक की दृष्टि से अति आवश्यक है। अजय नावरिया के संपादकीय में हंस का नवंबर 2019 अंक दलित साहित्य ‘द्वितीय सोपान’ खंड-1 और खंड-2 आया। हंस दलित साहित्य ‘प्रथम सोपान’ 2004 में श्यौराज सिंह बेचैन के संपादकत्व में आया। दीर्घ अंतराल के पश्चात आये इस अंक की चर्चा साहित्य जगत में बहस का मुद्दा बनी हुई है और हो भी क्यों न? सदियों से शिक्षा के नाम पर जिनके कान में सीसे पिघलाकर डाले गये, समानता के नाम पर जिनके गले में मटकी और पीठ पर झाड़ू बाँध दी गयी हो, अधिकार के नाम पर जिन्हें केवल मैला ढ़ोने और जूठन से पेट भरने पर मजबूर किया गया, वह अपने अधिकारों को लेकर प्रतिरोध नहीं करेगा तो उसकी लड़ाई कौन लडेगा?
यह अंक सम्पादकीय के अतिरिक्त कहानी, कविता, विचार-विमर्श,
ग़ज़ल, उपन्यास-अंस और बहिष्कृत भारत आदि भागों में बटा हुआ है। इस अंक की कहानियों
में मोहनदास नैमिशराय की ‘निज़ाम’, जयप्रकाश कर्दम की ‘चक्रव्यूह’, श्यौराज सिंह
बेचैन की ‘आंच की जांच’, कौशल पंवार की ‘नाम क्युकर चाल्लेगा’, कैलाश चंद चौहान की
‘दो दलित व्यापारी’ पूनम तुषामड़ की ‘ठोकर’, भीम सेन आनंद की ‘प्रेम बंधन’ और विकास
राजौरा की ‘जिला बदर, जात सदर’ आदि हैं।
कहानी:-इस अंक में कहानियों की मुख्य समस्या को यदि
देखें तो क्रमशः मोहनदास नैमिशराय की ‘निज़ाम’ सरकारी जेलों के भीतर जातिगत शोषण को
दर्शाती है। इसका जेलर सी.एल.दुबे. है जबकि कर्मचारी के सन्दर्भ में लेखक लिखते
हैं “हवलदार भी सवर्ण था और जेलर भी. यहाँ तक कि वार्डन भी.”1 जबकि
जेल के कैदियों के बारे में कहानी का पात्र प्रभात जब आरक्षण की लड़ने के चक्कर में
जेल जाता है तो पाता है “पचास कैदियों में जो भी था वह या तो दलित था या
आदिवासी, पिछड़ा था या अति पिछड़ा. उनके अलावा अल्पसंख्यक भी.”2 एक
कैदी ममदू जेल में आने का कारण बताता है जो इस प्रकार है “भर्राए हुए गले से
उसने बतलाया, “मेरी मां ठिकाने पर मैला कमाने गई थी सुबह ही सुबह. मालिक ने पहले
बलात्कार करने की कोशिश की, मां के इंनकार करने पर उसे मारा-पीटा. शाम को घर आने
पर पता चला. मैं पुलिस स्टेशन गया. रिपोर्ट दर्ज नहीं की. अगले दिन मुझे ही घर से
पुलिस ने मुझे उठा लिया. और चोरी के इल्जाम में मुझे जेल में बंद कर दिया. न
अदालत, न कोई जज, न कोई जिरह.”3 यह समस्या केवल एक कैदी के साथ नहीं है अन्य
कैदियों की यही स्थिति है। जयप्रकाश कर्दम की ‘चक्रव्यूह’ एक दलित लड़की रूपा द्वारा
मज़बूरी में अपनी कौमार्यता बेचने की कहानी है ‘मैं अपना कौमार्य बेचना चाहती
हूं’ श्यौराज सिंह बेचैन की ‘आंच की
जांच’ कहानी भारद्वाज द्वारा किसी दंगे में खोये हुए बच्चे की जाति की जांच कराने
से संबंधित है। वह कहता है“मुझे तो सबसे बड़ी व्याधि यानी इसकी जाति का पता करना
है. इसकी जाति और धर्म का पता लगाना परम आवश्यक है.”4 कौशल पंवार
की ‘नाम क्युकर चाल्लेगा’ दलित स्त्री जीवन की पीड़ा और अंधविश्वास को दर्शाती है,
जिसमें बेटे की चाह में क्या-क्या नहीं स्त्री को सहन करना पड़ता है “गजब का
पुत्र मोह पैदा हो चुका था सारे गांव में चाहे वे महिलाएं किसी उम्र की हों? कितनी
भी उनकी बेटियां क्यूं न हों? सब बेटा पैदा करना चाहती हैं और वो भी बाबा की उस
दवाई से. जैसे बेटी की मां बनकर मां नहीं कहलाती हों.”5 कैलाश चंद चौहान की ‘दो दलित व्यापारी’ कहानी दलित
समुदाय के भीतर व्याप्त चमार और वाल्मीकि जाति के भीतर भेदभाव को दर्शाती है “यार
मुकुल तू तो कह रहा था कि धीरेन अपनी ही जात का है.” “हां, तो?” उधर से मुकुल की
आवाज आई. “यार वो चमार है.उसके पिता गुजर गए हैं. इसलिए मैं उसी के गांव आया हूं,
यहीं पता चला.”6
‘ठोकर’ पूनम तुषामड़ की कहानी है। इस कहानी में
दलित लड़के (मोंटी) के किन्नर हो जाने से उसे अपने ही रिश्तेदारों में उपहास का
पात्र बनना पड़ता है। मोंटी की बहन रीना की शादी में जब शादी के जोड़े पर बात हो रही
थी, मोंटी आपबीती बताता है “बुआ ने कहा, ‘तू पहन के दिखा दे, तू क्या लड़की से
कम है.’ रीना का मुंह उतर गया. मम्मी अंदर जा कर खूब रोई,”7 जाति
के कारण जहाँ एक सैलून में वह काम करता था उसे वहां भी मालिक का उलाहना सुनना पड़ता
है “एक आदमी ने मुझसे बदसलूकी की. मैंने विरोध किया तो वह मालिक को बुरा-भला
कहने लगा. मालिक ने मुझे वहां से हटाकर साफ-सफाई के दूसरे काम करने को कहा तो
मैंने मना कर दिया. मेरे साथ ही काम करने वाले एक लड़के ने मुझे ताली बजाकर चिढ़ाते
हुए कहा, क्यों बे छक्के, साले भंगी की औलाद बड़ा आया था एक्सपर्ट बनकर, साले हमारी
बराबरी करेगा. कर अब सफाई यही औकात है तेरी.”8 यहाँ तक कि उसे
किन्नरों की बस्ती में भी जाति की समस्या से मुक्ति नहीं मिलती “एक दोस्त मुझे
किन्नरों की बस्ती में ले गया. वहां जाते ही उनके उस्ताद ने मुझसे वही सवाल पूछा,
किस जात से आते हो?”9
प्रेम बंधन भीम सेन आनंद द्वारा लिखित एक
दलित-सवर्ण प्रेम कथा है, जिसमें लड़की निधि दलित है और लड़का मयंक सवर्ण। दोनों एक
साथ पढ़ते हैं, दोनों के बीच शारीरिक संबंध भी बनते है, पढ़ाई ख़त्म होने के बाद दोनों
एक साथ काम भी करते हैं फिर भी मयंक की माँ राजी नहीं होती “जॉब लगते ही मयंक
ने निधि के बारे में अपनी मां को बताया तो उसकी मां ने साफ साफ बोल दिया कि किसी
भी कीमत पर निधि को इस घर में स्वीकार नहीं किया जाएगा. तू दलित और मुसलमान छोड़कर
किसी से भी शादी कर ले, हमें मंजूर है.”10 अंततः दोनों को अलग होना
पड़ता है। किन्तु कुछ साल बीतने के बाद दोनों जाति को नकारते हैं और शादी के बंधन
में बंधते हैं। इस अंक की अंतिम कहानी विकास राजौरा की ‘जिला बदर जात सदर’ है। यह
कहानी दलित लड़के की शादी में घोड़ी पर नहीं चढ़ने देने की घटना से प्रेरित है। लेखक
ने बहुत ही रचनात्मकता के साथ ठाकुरों के घर से बारात निकालने का कार्य किया है।
यहाँ दलित मुक्ति के प्रसंग में रामचंद्र पहलवान की भूमिका प्रमुख है जो दिल्ली से
आया है। वह ठाकुरों को दलित दरोगा रंजित सिंह बैरवा को जाकर सब कुछ बता देता है।
इस प्रकार की घटनाओं को रोकने के लिए दलितों को एकत्रित होना, शिक्षित होना और
राजनीतिक तौर पर मजबूत होना बहुत जरुरी है।
इन कहानियों में जाति से मुक्ति के जो
संदर्भ आये हैं वह अलग-अलग हैं किन्तु महत्त्वपूर्ण है। मोहनदास नैमिशराय की ‘निज़ाम’
कहानी के अंत में रहमत कहता है“प्रभात भाई, आरक्षण लड़ाई तो लड़ो, पर इस मुल्क का
निजाम भी बदलो. मेरे मरहूम अब्बा यही कहा करते थे.”11 पृष्ठ संख्या-11 वही जयप्रकाश कर्दम की ‘चक्रव्यूह’
में अशोक रूपा को फिल्म से आये प्रस्ताव को अपनाने को कहता है “मैं तो कहता
हूं, यह बहुत अच्छा प्रस्ताव है. इस प्रस्ताव को स्वीकार कर लेना चाहिए. गली के
आवारा लड़कों की छेड़छाड़ और फिकरेबाजी से भी मुक्ति मिलेगी और राजन पांडेय और सत्ते
पहलवान जैसे गुंडों के आतंक से भी मुक्त हो जाओगी.”12 श्यौराज सिंह
बेचैन की ‘आंच की जांच’ में रहीमुद्दीन कहता है “भई हमारे लिए बच्चा गैर नहीं
है. हम तो यह तसव्वुर भी नहीं कर सकते कि बच्चा हमारा नहीं है. आखिर पंडित
मियां-बीवी तो पुश्तों से हमारे जिगरी दोस्त हुआ करते थे. ईद की सिवइयां, होली-दीवाली
की खीर हम एक साथ खाते थे.”13 एक साथ खाना कब वैमनष्यता और ऊँच नीच का आधार बन
गया इसका किसी को पता नहीं चला, किन्तु केवल एक तबका जिसे जाति और धर्म में भेदभाव
करना आता है उसका नंगा स्वरूप श्यौराज सिंह ने प्रस्तुत किया है। कौशल पंवार की ‘नाम
क्युकर चाल्लेगा’ में लेखिका ने फूली के माध्यम से लड़का-लड़की के भेद से मुक्ति की
ओर संकेत किया है “फूली एक बैंक की बड़ी अधिकारी बनकर अपने चाचा का नाम पूरे
गांव में करवाकर शहर चली गई.”14 कैलाश चंद चौहान की ‘दो दलित
व्यापारी’ में “हां, है तो अपना आदमी ही. सभी दलित एक ही तो हैं. मैं वाल्मीकि,
वो चमार...क्या फर्क है...”15 पूनम तुषामड़ की ‘ठोकर’ का मोंटी पढ़ाई,
घर, रिश्तेदार सब छोड़ देता है और एक अलग जिंदगी जीने का प्रयास करता है “अब मैं
एक लेडी पार्लर/स्पा चलाता हूं अपनी एक दोस्त के साथ. वहां मुझे सब प्यार करते
हैं.”16 मोंटी अपना जीवन बसर करना भली भाँति जानता है। आर्थिक
मजबूती ही उसे जाति और किन्नर रूप से मुक्ति दिला सकती है। भीम सेन आनंद की ‘प्रेम
बंधन’ में निधि और मयंक एक दूसरे के प्रेम के माध्यम से जाति से निजात पाते हैं
किन्तु इस बात को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता कि वे शिक्षित और आर्थिक रूप से मजबूती
भी हैं“यह देख निधि का पूरा परिवार गर्वित महसूस कर रहा था. उन्हें ऐसा लगा
जैसे इस प्रेम बंधन ने समाज में व्याप्त जाति बंधन को तोड़ने में सफलता प्राप्त कर
ली है.”17 विकास राजौरा की ‘जिला बदर, जात सदर’ में रामचंद्र
पहलवान कहता है “चाचा तू फिकर मत कर अब यह लोग तुझे कभी नहीं छेड़ेंगे, इन सबके
पक्के काग़ज बनवा के आ रहा हूं थाने में. और तू एक बात बता मेरा क्या बिगाड़ लेंगे
यह. पहलवान हूं, जोर मुझसे कर नहीं सकते, ज्यादा से ज्यादा जिला बदर करेंगे, वो तो
मैं खुद ही हो रहा हूं कल सुबह की रेल से.”18 आदि हैं।
कविता: कविताओं में सुदेश तनवर, कुसुम वियोगी, अवनीश
गौतम, नरेन्द्र वाल्मीकि, विद्या चरण, कविता विकास, अनामिका अनु, नूपुर चरण,
रविकान्त, मूसा खान अशांत बाराबंकवी, नीलम, जितेन्द्र विसारिया जैसे लेखकों की
गंभीर कविताएँ पढ़ने को मिली हैं। हिन्दी साहित्य में कविता के इतिहास की बहुत लम्बी
परम्परा रही है किन्तु दलित कविता ने उसमे सेंध लगाने का कार्य कर दिया है। उनके
लेखन में गाँव-शहर से लेकर भारत के कोने कोने की चेतना के साथ साथ समाज के
पिछड़ेपन, प्रताड़ना और प्रतिरोध को देखा जा सकता है। इस अंक की कविताओं में एकलव्य, शंबुक, बुद्ध, कबीर, फुले, अंबेडकर ,
ओमप्रकाश वाल्मीकि और प्रो. तुलसीराम को याद किया गया है। इन कविताओं में
राममंदिर, मूर्तियों की पूजा, धर्म और संस्कृति, वर्णव्यवस्था डिजिटल देश, आदि के प्रति गहरे असंतोष के साथ जातिवादी
मानसिकता और शोषण के खिलाफ प्रतिरोध दिखाई पड़ता है। सुदेश तनवर ने ‘पिस्सू’ कविता
में समाज के ऐसे व्यक्ति जो दूसरों से ऊँच नीच का बर्ताव करते हैं, दूसरों का हक
मरते हैं, अपने नीजि स्वार्थों के लिए समाज में वैमनष्यता फैलाते हैं उनके घर के
संदर्भ में लिखते हैं “मंदिर/ उनका घर है/ श्मशान दुकान”19 जबकि वे
समाज में हर जगह मौजूद हैं “यहां तक कि/ ये गांव की पंचायत/ संसद और विधानसभाओं
के/ हर कोने में घुसे हुए हैं/ बच्चों के किंडरगार्टन/ स्कूल कॉलेज विश्वविद्यालयों/
अस्पतालों तक में/ इन्होंने पैठ बना ली है/ उनके पहरुए / न्याय की कुर्सियों में/
धंसे हुए हैं”20 वर्त्तमान भारत की वास्तविकता की जो तस्वीर इन कविताओं
में देखने को मिलती है उसकी उपेक्षा नहीं की जा सकती। सुदेश तनवर की कविता में
गोदी मीडिया पर तीखा व्यंग्य देखने को मिलता है “वे और उनके समर्थक/ हाथों में
गेरुवा झंडा उठाए/ पोहचों में लाल-पीला सूत बांधे/ उंगलियों में नगीनों की
अंगूठियां पहने/ उनके स्पांसर्ड लाइव प्रोग्राम/ किसी भी सीमा तक/ जाने को, उतारू
हो गए हैं.”21 क्या समाज की वास्तविकता से मुहं मोड़ा जा सकता है? यदि
नहीं तो यह वास्तविकता ही है। आज के भारत में जब बड़े बड़े साहित्यकारों ने सत्ता को
समर्थन कर अपना इमान नेताओं के क़दमों में रख दिया ऐसे में एक नया विमर्श अपनी
समस्याओं को बखूबी रखने का कार्य कर रहा है। कुसुम वियोगी अपनी कविता अहसास में
लिखती हैं “जिसे,/ जगाना चाहते हो,/ वो, आंखे खोल/ चबौना चबा रहा है!”22
चीखते चिल्लाने से कुछ हो नहीं रहा हैं। अवनीश गौतम जब कविता के लिए शब्द ढूंढते
है तो उन्हें जो शब्द मिलता है वह इस प्रकार है “दो छोटे-छोटे शब्द आए रोते और/
शिकायत करते एक दस साल का/ एक बारह साल का/ दोनों को पीट-पीट कर मार डाला गया था/ आंसू
गालों पर सूख गए थे”23 क्या यह पंक्तियाँ मध्यप्रदेश के शिवपुरी जिले
के भावखेड़ी में कुछ सामंतो द्वारा की गई निर्मम हत्या की याद नहीं दिलाता? कुछ
मुख्यधारा के लेखक बोलते हैं ‘दलितों ने अपनी रचनाओं में अपना ही रोना रोया है।’
जब धर्म, परम्परा, संस्कृति, रीति-रिवाज, समाज के हर क्षेत्र में जिन्हें दुत्कारा
गया हो, मैं एक पाठक के तौर पर समझता हूँ कि सत्ता के तलवे चाटाने से बेहतर है
प्रतिरोध करना। उनकी अगली कविता जैसे हम हैं में लिखते हैं कपड़े, तेल, अन्न, आटा,
गलियां, नगर, फूलमालाएं, कुर्सियां, पलंग, बग्घियां, रिक्शे, सड़कें सब हमने बनाई
हैं किन्तु हमने “हमने नहीं जलाए खेत/ हमने नहीं जलाईं बस्तियां/ हमने नहीं कराई
बेगार/ हमने नहीं किए बलात्कार/ हमने नहीं बनाई गालियां और गोलियां/ हमने नहीं
बनाई गप्पकथाएं/ नहीं तालों में बंद रक्खे शब्द”24 यह सब नहीं बनाए हैं।
नरेन्द्र वाल्मीकि ने ‘ओमप्रकाश’ कविता में ओमप्रकाश वाल्मीकि को याद करते हुए
उनके संघर्ष को रखने का प्रयास किया है। वे लिखते हैं “उसके बच्चे पढ़-लिखकर भी
नहीं पाते वो सम्मान/ जो अन्य पा जाते हैं, मात्र उच्च कुल में पैदा हो जाने से”25
विद्या चरण सवाल, ईश्वर, जड़बद्ध, तलाश कविता के माध्यम से अपनी बात रखते हैं “है,/
आज भी जारी,/ शोषण-उत्पीड़न-दलन-दमन,/ क्योंकि जिंदा है,/ आज भी वह/ आज भी वह/
सामंती सोच/ और मानसिकता,/ कि बराबर नहीं है आदमी;/ दृढ़ है यह विश्वास,/ इस भेद का
निर्माता,/ स्वयं ईश्वर है.”26 कविता विकास अपनी कविता ‘उपेक्षा’ में उपेक्षित
की मौजूदगी दर्ज कराती हैं “मैं समाज के हाशिए पर खड़ा/ देख रहा हूं कि/ सड़कें
मेट्रो में तब्दील हो गईं/ झोपड़ियां गगनचुंबी इमारतों में/ दुकानें मॉल में और/
खेत कारखानों में/ हर तरफ बदलाव की आंधी है/ कुछ नहीं बदला तो केवल वर्णव्यवस्था/
जहां जब था, राजा, राजा है और/ सेवक, सेवक”27 अनामिका अनु अपनी कविता ‘दलित’
में लिखती हैं “जाति नहीं है अनुशासन/ न ही यह कोई व्यवस्था है/ यह खालिस अराजकता/
गई परोसी थाली में/ घूंट-घूंट में गई पिलाई/ ये जहर था/ यह नहीं था पानी!”28
बोलना जरूरी है, हार्शू क्रैब, स्त्रियां जो मुक्त हैं और जिजीविषा आदि कविताओं
में स्त्रियों की आवाज को उठती उनकी कविताएँ हैं “स्त्रियां/ जो मुक्त हैं और/
लिखती भी हैं/ अपनी/ सहज बुद्धि से/ स्त्रियों पर/ जीती हैं/ अपनी धुन में/ अपने
मूल्यों पर/ नकार दी जाती हैं/ स्त्रियों के ही द्वारा/ ढकेल दी जाती हैं/ हाशिए पर”29
रविकान्त की दो कविताओं में ओमप्रकाश वाल्मीकि और तुलसीराम को याद किया गया है “
लेकिन, वाल्मीकि जी!/ तुमने तो तोड़ डाले मठ और गढ़ सब/ कर दिया खंडित ईश्वर सनातन/
उखाड़ फेंका धर्म का पहिया/ चकनाचूर कर दिए स्वर्ग और नरक”30 ऐसे ही
तुलसीराम के सन्दर्भ में लेखक लिखते हैं “धर्म इतिहास नहीं होता/ अलबत्ता, इतिहास/
बन सकता है धर्म,/ इतिहास वह नहीं कहता/ जो धर्म कहता है.”31 दोनों के
जीवन के संघर्ष भले ही अलग हों किन्तु लड़ाई एक ही है जातिवादी खोखली मानसिकता से
मुक्ति। मूसा खान बाराबंकवी लिखते हैं “इसी नाले के किनारे/ मौजूद झुग्गियों में/
बसा है मानवता का/ पैबन्द लगा वजूद/ जिसे/ हर हर साल/ कोई बुलडोजर/ गुर्राता ऐंठता
हुआ/ ज़मीन में मिला देता है”32 गाँव से दलित जो शहरों में बसे हैं वह
कहाँ बसे हैं। उन्हें नेता कैसे वोट को चाकरी में फंसाते हैं इसका जिवंत दस्तावेज
है यह कविता। नीलम अपनी कविता त्योहारी में सवाल खड़ा करती हैं “क्या यही है मेरा
देश धर्म/ जहां मूर्तियों की पूजा की जाती है/ जहां दूध की नदियां बहाई जाती हैं/
जहां घी के दिये जलते हैं/ जहां जिंदा इंसान किए जाते हैं दफ्न/ क्या हम उस देश के
वासी हैं/ जहां दाने दाने को भी मरते हैं लोग”33 सत्येन कुमार की कविता
‘एक गुनाहगार का वसीयतनामा’ में दो पक्षों शोषक और शोषित के काली सच्चाई को दिखाया
गया है “तुमने धर्म बनाए/ जातियां बनाईं/ ईश्वर को गढ़ा/ उन्हें अपना रूप दिया.”34
किन्तु जिनका निर्माण तुमने किया
उन्हीं के द्वारा शोषण भी किया “अपने गढ़े ईश्वर से/ हमें घृणित, अपराधी, असभ्य
कहकर/ इस पृथ्वी से बाहर धकेलते रहे/ हम सिर्फ तुम्हारी एय्याशी के साधन रहे./
तुम्हारी गढ़ी सभ्यताओं, संस्कृतियों, गढ़े देवताओं से/ अछूत करार दिए गए/ हमारी
बनाई दुनिया को हमसे छीना गया/ तुमने धर्म, जाति, धर्मस्थलों की आड़ में छुपकर/
आर्थिक संसाधनों की लूट मचाई”35 जिस प्रकार दलित विशेषांक की कविताएँ
जातिगत पीड़ा, संघर्ष और प्रतिरोध को अभिव्यक्त करती है, उसी प्रकार रामप्रकाश
बैरवा की गजलें जीवन की पीड़ा, संघर्ष और प्रतिरोध को दर्शाती हैं “कफ़न का कपड़ा भी मुझको
ज़िंदगी माफ़िक मिला/ पूरे जनाज़े आधा नंगा शव मेरा रोता रहा”36
विचार-विमर्श:- विचार और विमर्श में दलित साहित्य के लेखकों
और समीक्षकों के सैद्धांतिक और व्यावहारिक विचारों को प्रस्तुत किया गया है। पहला
विचार कंवल भारती का ‘दलित कहानी के विकास पर कुछ नोट्स’ है। इस आलेख में ‘नई
कहानी बनाम दलित कहानी’, ‘हिंदी में दलित कहानी का उद्भव’, समकालीन कथाकार तथा
वर्तमान दलित कहानी’ में बांटते हुए दलित कहानी की यात्रा को प्रस्तुत किया है। नई
कहानी के सन्दर्भ में वे प्रश्न खड़ा करते हैं “नई कहानी के उद्भावक कहते हैं कि
नई कहानी में अनुभूति व्यष्टि रूप से समष्टि रूप में आई है. मतलब, उसमें व्यक्ति, समाज
के दुख-दर्द अभिव्यक्त हुए हैं. अगर यह नई कहानी की परिभाषा है, तो ऐसी एक भी नई
कहानी बता दो, जिसमें दलित समाज का दुख-दर्द चित्रित हुआ हो?”37
प्रश्न बहुत तार्किक और वाजिब भी है। उनका मानना है जब सुखासीन समाज के लेखकों ने
सामाजिक भेदभाव और तिरस्कार की समस्या से ग्रस्त ही नहीं हुए, तो उसकी अनुभूति भी
कहाँ से लाती? निस्संदेह जिस पीड़ा और तिरस्कार को सदियों से दलित समाज ने झेला है
उसकी पीड़ा को वही समझ सकता है। वह आगे दलित कहानी के उद्भव और विकास को दर्शाते
हुए लिखते हैं “सवर्ण समाज गाय को माता कहता है, पर जैसे ही गाय मरती है, उसकी
माता उनके लिए अछूत हो जाती है. फिर उसे छूना तो दूर, उसके पास खड़े होने में भी
उनको पाप लगता है. उसे उठाकर फेंकने के लिए भंगी या चमारों में से जो भी मरे हुए
जानवर को उठाने का काम करता है, उसको बुलाया जाता है. ऐसे अवसरों पर वे
महत्त्वपूर्ण हो जाते हैं. जब वे उपलब्ध नहीं होते या आने से मना करते हैं, तो
उन्हें मां-बहन की गालियां दी जाती हैं और मारा-पीटा जाता है।”38
इतना ही नहीं जिस मुख्यधारा के लेखकों ने कभी दलित के घर पानी नहीं पीया, जिसने कभी
खाना नहीं खाया यहाँ तक की अपने दरवाजे पर खड़ा नही होने दिए वह किसी दलित की
संवेदना, दुख और दर्द की अभिव्यक्ति कैसे कर सकता है, उसे दर्ज़ करने से भी पाप लगेगा।
बहरहाल कंवल भारती ने ओमप्रकाश वाल्मीकि को ‘समकालीन दलित साहित्य का बौद्धिक
नेतृत्व’ कर्ता स्वीकार किया है। दलित साहित्य के संदर्भ में ओमप्रकाश वाल्मीकि के
उदाहरण को प्रस्तुत करते हैं “दलित साहित्य समाज में फैले आर्थिक शोषण के
विरुद्ध एक सशक्त क्रांति है, किन्तु मार्क्सवादी या साम्यवादी जिस प्रकार इस
क्रांति के मार्ग को लोकबद्ध मानते हैं, दलित साहित्य वैसा नहीं मानता. अंबेडकरवाद
के रूप में आज दलित रचना साकार हो रही है. अंबेडकरवाद एक विशिष्ट सीमा तक मानवीय
स्वतंत्रता को नियन्त्रित करने की बात स्वीकार करता है. लेकिन वर्ग संघर्ष के नाम
पर स्वतंत्रता, समता और बंधुता जैसे मूल्यों के हनन को स्वीकार नहीं करता है.”39
हिंदी के मूर्धन्य मार्क्सवादी आलोचक नामवर सिंह की दृष्टि बहुत हद तक साफ़ और
स्पष्ट थी। जब वैभव सिंह अपने साक्षात्कार में उनसे पूछते हैं ‘आज के समय में कौन
सी विचारधारात्मक चुनौतियाँ वामपंथ को नुकसान पहुँचा रही हैं?’ इस पर नामवर जी का
जवाब था ‘धर्मनिरपेक्षता के लिए लड़ने वाली सबसे विश्वसनीय ताकत वामपंथ ही हो सकती
है, लेकिन मेरे अनुसार वामपंथ के आगे सबसे गम्भीर चुनौती भू-मंडलीकरण के अलावा
दलित और मंडल की है।’ संख्या ओमप्रकाश वाल्मीकि और नामवर सिंह के विचारों में जो क्रमशः
अंबेडकरवाद और मार्क्सवाद की भिन्नता दिखाई देती है, इसमें कोई दो राय नहीं है कि जिस
ताकत और तार्किकता से दलित साहित्य अग्रसर हो रहा है वह बहुत जल्द धर्मनिरपेक्षता के
सभी मुद्दों को अपने भीतर समेटने में सक्षम होगा। कंवल भारती वर्तमान कहानीकारों
में अजय नावरिया की कहानियों के संदर्भ में वे लिखते हैं “अजय नावरिया की
कहानियां कलात्मक हैं. दूसरे शब्दों, अजय नावरिया की कहानी से दलित कहानी में
कलावादी युग का आरंभ होता है.”40 इनके अतिरिक्त उन्होंने वर्तमान
दलित कहानीकारों के नाम गिनवाएं है जिनमे “मुकेश मानस, रूप नारायण सोनकर और
कैलाश चन्द्र चौहान भी सक्रिय कथाकार हैं. रजत रानी मीनू, अनीता भारती, कौशल
पंवार, पूनम तुषामड़, रजनी दिसोदिया, जितेन्द्र बिसारिया, कैलाश वानखेड़े, हेमलता
महिश्वर, टेक चन्द, राज वाल्मीकि आदि भी बेहतर दलित कहानी लेखक रहे हैं.”41
रजत रानी मीनू के विचार-विमर्श ‘दलित स्त्री-मुक्ति की सैद्धांतिकी’ में
दलित मुक्ति के कई सारे सवाल हैं जिनमे ‘हर युग में यह देखना आवश्यक है कि
स्त्रियों की गुलामी के कौन-कौन से कारण हैं और मुक्ति के क्या उपाय हैं?’,
‘तत्कालीन समाज व्यवस्था क्या है?’, ‘धर्म और संस्कृति क्या भूमिका अदा कर रही है?
और उस युग में स्त्री मुक्ति के क्या प्रयास किए गए हैं?’, ‘आज दलित स्त्रियों की
मुक्ति के आयाम क्या हैं?’, ‘वे कैसे शिक्षित होंगी? कैसे स्वावलंबी होंगी? कैसे
उनमे दलित स्त्रीवाद की चेतना जागेगी’, ‘दलित स्त्री को जातीय भेदभाव से मुक्ति कब
मिलेगी?’, जब उसका पूरा समाज, उसका पति जाति भेद का शिकार होगा तो उसकी आजादी के
क्या मायने होंगे?’ आदि सभी प्रश्न किसी न किसी रूप से दलित स्त्री के इर्द गिर्द
घूमते रहते हैं। किन्तु अशिक्षा और सामाजिक परंपरा और संस्कृति की आड़ में या तो
स्त्रियाँ शोषण को स्वीकार करते हुए, घुट-घुट कर मरने पर मजबूर हैं रजत रानी जी
लिखती हैं “किसी भी स्त्री को स्वावलंबी और समर्थ बनाए बगैर उसकी कल्पना नहीं
की जा सकती. उसे समर्थ बनाने के लिए शिक्षा खास कर गुणकारी शिक्षा देनी होगी.”42
इन सभी प्रश्नों के अतिरिक्त वे दलितों के साथ सरकारी कार्यालयों में अत्याचार, दलित
के नाम में ‘सिंह’ लगाने से राजपूतों द्वारा उसकी ‘मूंछ’ कटवाने की घटना, 16 दिसम्बर
के निर्भया के साथ हुई घटना, बरेली के बहेड़ी की घटना या पानीपत में घटी दो लड़कियों
की दूर्घटनाएं, आदि को एक स्त्री के सन्दर्भ में उठाते हुए कड़ी निंदा करती हैं।
यहाँ तक की दलित शिक्षित तथा अशिक्षित स्त्रियों की विभिन्न समस्याओं को चित्रित
करते हुए मुख्यधारा की सवर्ण स्त्रियों द्वारा दलित स्त्रियों के साथ किये जाने
वाले शोषण का भी जिक्र बखूबी किया है। रजत रानी मीनू समाज में होने वाले सरोगेसी
के संदर्भ में लिखती हैं “सरोगेसी करने वाली अक्सर गरीब दलित, आदिवासी और पिछड़े
वर्ग की स्त्रियां ही होती हैं. हां, कुछ उदारमना सवर्ण स्त्रियां भी होती हैं.”43
हेमलता महिश्वर अपने विचार-विमर्श ‘दलित स्त्रीवाद की सैद्धांतिकी’ में
हिन्दू धर्म के कर्मकांडों से रूबरू कराते हुए ब्राह्मणवाद पर करार प्रहार है। इस
आलेख में हेमलता महिश्वर लिखती हैं दलित स्त्रीवाद की रचनाओं में जो ‘एक बेचैनी,
व्यग्रता, तनाव या उनके स्वर में जो तल्खी देखने को मिलती है ‘वह थेरी गाथाओं की
याद दिला देती है.’ हेमलता महिश्वर का मानना है कि “थेरी गाथा स्त्री संसार की पहली
ज्ञात प्रमाणिक रचनाएं हैं जो पूरी सामर्थ्य के साथ स्त्री स्वातंत्र्य को
प्रस्तुत करती हैं. थेरी गाथा का यह स्वर ब्राह्मणवाद और पितृसत्ता को खुली चुनौती
देता है.”44 हेमलता महिश्वर की दृष्टि दलित स्त्रीवाद को लेकर बहुत
साफ़ और स्पष्ट है। उनके लेखन में दलित स्त्रीवाद की वैचारिकी थेरी गाथा से आरंभ
होकर गौतमबुद्ध, फुले दंपति से होती हुई अंबेडकर के हिंदू कोड बिल और विचारधारा से
प्रभावित है। हेमलता महिश्वर दलित स्त्रीवाद के प्रस्थान बिंदु के संदर्भ में
लिखती हैं “तमाम पौराणिक ग्रंथ जिनके आधार पर ब्राह्मण अन्य मनुष्य के मुकाबले
अपनी वर्चस्वता को अपने ही बनाए नियमों के आधार पर सर्वश्रेष्ठ स्थापित करता है, ब्राह्मणवाद
है. सर्वश्रेष्ठता के इसी भाव को पूरी अतार्किकता के साथ संचालित करने में जो
सहभागी होता है, ब्राह्मणवाद का पैरोकार है. ब्राह्मणवाद की जंजीरों को तोड़ने के
लिए डॉ. अंबेडकर ने बाईस प्रतिज्ञा दी हैं. दलित स्त्रीवाद की सैद्धांतिकी निर्मित
करने के लिए यह एक अनिवार्य प्रस्थान बिंदु है.”45 हेमलता महिश्वर भारतीय
स्त्रियों को उच्च वर्णीय, दलित और आदिवासी स्त्री के रूप में देखती हैं वे लिखती
हैं “उच्च वर्णीय स्त्रियों के स्त्रीवाद से आशय केवल और केवल आर्थिक संबल,
आर्थिक सुरक्षा, संपत्ति में अधिकार प्राप्त करने तक सीमित कर दिया. दलित और
आदिवासी स्त्री के लिए इससे भी महत्त्वपूर्ण मुद्दा था आत्मसम्मान का, अपने जीवन
का. दलित स्त्री का जीवन ही सुरक्षित नहीं हैं. जीवन बचेगा तभी तो आर्थिक आधार
चाहिए. अधिकांश दलित परिवारों में कन्या भ्रूण हत्या नहीं होती. कन्या भ्रूण हत्या
तो अधिकांशतः उच्च जातियों और धनाढ्य लोगों की समस्या है. दलित स्त्री को गैर दलित
स्त्रियों में ही सम्मान नहीं मिलता.”46
‘सांप्रदायिकता का प्रश्न और दलित स्त्री कविता’ नमक विचार-विमर्श में
बजरंग बिहारी तिवारी दलित कविताओं में सांप्रदायिकता की समस्या को देखते हैं। दलित
कविताओं में अपने समाज में घटने वाली हिंसा और सांप्रदायिक घटना को जगह मिली है। बजरंग
बिहारी तिवारी दलित साहित्य के सन्दर्भ में लिखते हैं “यह स्वीकारने में दिक्कत
नहीं होनी चाहिए कि दलित साहित्य विमर्श ने अपनी लड़ाई को मुख्यतः जाति-वर्ण तक
सीमित रखा.”47 इस बात को स्वीकारने में हर्ज नहीं है कि दलित कविता
ने जिस प्रकार समाज के रोजमर्रा की घटनाओं को जगह देने का कार्य किया है, यह आगे
आने वाले दलित साहित्यकारों के लिए नई दिशा भी निर्मित करती है। बजरंग बिहारी
तिवारी का मानना है कि “सांप्रदायिक हमलों के पीछे धार्मिक भिन्नता आवरण का काम
करती है, बहाना भर होती है. धर्मेत्तर कारण ही प्रमुख होते हैं.”48
जबकि उसका सांप्रदायिक दंगे का उद्देश्य केवल और केवल “अल्पसंख्यक समुदाय के
आर्थिक आधार को छिन्न-भिन्न करना अक्सर सांप्रदायिक दंगों का लक्ष्य हुआ करता है. दंगे
की विभीषिका सबसे ज्यादा स्त्रियां, बुजुर्ग और बच्चे झेलते हैं.”49
बजरंग बिहारी तिवारी का यह भी मानना है कि “दलित स्त्री रचनाकार
इस पीड़ा को समझती हैं. वे भी जानती हैं कि जो ताकतें अल्पसंख्यकों को निशाना बनाती
हैं वही जातिवादी हिंसा में भी शामिल रहती हैं.”50 दलित लेखिकाओं
ने न केवल इस समस्या का शिनाख्त किया है बल्कि उसको अपनी कविता में जगह देने का
कार्य भी किया है। बजरंग बिहारी तिवारी ने विभिन्न दलित स्त्री कवयित्रियों में
रजनी तिलक, सुशीला टाकभौरे, हेमलता महिश्वर, प्रियंका सोनकर, पूनम तुषामण, रजनी
अनुरागी, अनीता भारती तथा युवा कवियित्री रानी कुमारी आदि की कविताओं में मुस्लिम अल्पसंख्यकों
के साथ समसामयिक समय में होने वाली सांप्रदायिक गतिविधियों की शिनाख्त कर
अभिव्यक्ति की है। इन कविताओं में अहमदाबाद की बिलकिस बानो, दादरी कांड 2015 में
हुई अखलाख की हत्या से लेकर, जुनैद आदि के साथ हुई बर्रबरता को दिखाने का प्रयास
किया गया है।
विचार विमर्श में दो आलेख दलित चेतना के सुविख्यात
कवि मलखान सिंह और सामाजिक कार्यकर्त्ता और साहित्यकार रजनी तिलक पर केन्द्रित है।
‘दलित प्रतिबद्धता का संवाहक: कवि मलखान सिंह’ के जीवन और साहित्य के संघर्ष को नामदेव
ने सूत्रबद्ध किया है। नामदेव लिखते हैं “यारों के यार थे मलखान सिंह.” कैंसर जैसी
घातक बिमारी से झूझते हुए भी उनके कविता की बानगी को एक सीमित दायरे में नहीं
बांधा जा सकता। कवि मलखान सिंह के संघर्ष को उनकी कविता ‘मैं आदमी नहीं हूँ’ के
माध्यम से देखा जा सकता है “मैं आदमी नहीं हूँ स्साब/ जानवर हूँ / दो पाया जानवर /
जिसे बात-बात पर / मनुपुत्र-मां चो- बहन चो- / कमीन कौम कहता है.”51 एक
लेखक जिसने पग-पग पर इस प्रकार की सामाजिक वर्जनाओं को झेला है उसके सन्दर्भ में
लिखना नामदेव के लिए आसान नहीं रहा होगा। उनकी कविताओं के संदर्भ में वह लिखते हैं
“दलित साहित्य की संवेदनात्मक और कलात्मक उत्कृष्टता का नायाब नमूना हैं मलखान
सिंह की कविताएं. यहीं पर आकर मलखान सिंह की कविताएं दलित यथार्थ को व्यापक
दृष्टिकोण से आत्मसात् करती हुईं दलित साहित्य की बौद्धिक संपदा की विरासत की
पुख्ता सेतु का निर्माण करती हैं.”52 निसंदेह एक बड़ा कवि जो साथी भी
रहा हो, उसके जीवन पर कम से कम शब्दों में लिखना एक चुनौती भी होती है इस आलेख में
देखा जा सकता है कि उस चुनौती नामदेव ने पूर्ण करने में कोई कसर नहीं छोड़ा है।
दूसरा विचार विमर्श ‘दलित स्त्री जीवन का नवाख्यान रचती हुई कहानियां’ रजनी
अनुरागी द्वारा विश्लेषित है। रजनी तिलक भाषा की सहजता, सरलता और मानवीय संवेदना को
अनुभव के आधार पर आत्मसात कर साहित्य का सृजन कार्य करती रहीं। रजनी अनुरागी उनके
कहानी संग्रह ‘बेस्ट ऑफ करवा चौथ’ में संकलित कहानियों के अध्ययन के आधार कर लिखती
हैं “इन कहानियों को पढ़ते हुए कितनी ही बार आभास होता है कि हम रजनी तिलक की
कहानियों को नहीं बल्कि रजनी तिलक और उनके इर्द-गिर्द के लोगों के जीवन का
आत्मकथात्मक लघु वृतांत पढ़ रहे हैं. इन कहानियों को उनके आत्मकथा के साथ पढ़ना एक
गंभीर पाठक के लिए और भी गहरा अनुभव इस मायने में हो सकता है कि जो गैप इन
कहानियों के विन्यास में दिखाई पड़ते हैं उन्हें उनकी आत्मकथा पूरा करती है और जो
गैप उनकी आत्मकथा में दिखाई पड़ते हैं उन्हें इस संग्रह की कहानियां पूरा करती हैं.
इस मायने में ये कहानियां आत्मवृत्तात्मक हैं.”53 इन
आत्मवृत्तात्मकतापूर्ण कहानियों में स्त्री जीवन की त्रासदियों और संघर्षों की
अभिव्यक्ति अधिक देखने को मिलती है। सामाजिक कार्यकर्त्ता होने के कारण रजनी तिलक की
कहानियों में ग्रामीण जीवन के अंधविश्वास से लेकर ब्राह्मणवादी संस्कार,
पितृसत्ता, यौन शोषण, असमानता, हिंसा, छुआछूत, द्वेष आदि सामाजिक विकृतियों के
प्रति निषेध देखने को मिलता है।
‘बिहार राज्य और दलित साहित्य’ मुसाफिर बैठा का विचार-विमर्श है। मुसाफिर
बैठा दलित साहित्य के उद्भव के संदर्भ में लिखते हैं “हम सब जानते हैं, दलित
साहित्य का अविर्भाव दलित तबके को द्विजों द्वारा सदियों से मिलती आई हकमारी से
उपजी खुदमुख्तारी की एसर्टिव भावना के तहत हुआ है.”54 मुसाफिर बैठा
भारतीय वांग्मय को “ऋग्वेद एवं मनुस्मृति से लेकर अलग-अलग कालखंडों में लिखी
गईं वेद, पुराण, महाभारत, रामायण जैसी धार्मिक अंधविश्वास का विष एवं जातीय भेदभाव
व् दुराग्रह फैलाने वाली कथित धार्मिक किताबों के कुछ कुख्यात आदेश-उपदेश एवं
प्रावधान इंगित करते हैं कि सवर्ण कितने जमाने से बहुजनों के प्रति दुराव एवं
हिंसक व्यवहार रखते आए हैं.”55 मुसाफिर बैठा की दृष्टि में दलित
साहित्य कबीर और रैदास के प्रतिरोध से निर्मित होकर अंबेडकरवादी बुनावट की
काव्यधारा है। मुसाफिर बैठा बिहार में दलित लेखकों की साहित्यिक रचनाओं की परंपरा
दर्शाते हुए बुद्धशरण हंस, विपिन बिहारी, प्रह्लाद चंद्र दास, दयानंद बटोही,
कावेरी, परमानंद राम, रामेश्वर राकेश, जियालाल आर्य, वीरचन्द्र दास, बाबूलाल
मधुकर, देव नारायण पासवान ‘देव’, रंजु राही, कर्मानंद आर्य, विभाश कुमार,
नागेन्द्र प्रसाद, अजय यतीश, कीर्त्यानंद कलाधर, जयप्रकाश फाकिर, रमाशंकर आर्य आदि
के अतिरिक्त एक लम्बी सूची बिहार की साहित्यिक परम्परा को आगे ले जाने का कार्य कर
रही है।
उपन्यास अंश:- ‘मौसी का गांव’ प्रह्लाद चंद्र दास के नए उपन्यास
का अंश है। उपन्यास के इस अंश को पढ़ने से यह भली भाँति ज्ञात होता है कि दलित
कितना भी हिन्दू धर्म के कर्मकांडों को मजबूत करने के लिए उनके साथ कंधे से कंधा
मिलाए किन्तु जातिगत शोषण उनके साथ बरकरार ही रहने वाला है। इस अंश में विनय जो
किसी काम से अपने मौसी के घर आया है। मौसा संतराम उसे रात्रि के समय रामायण गान
में लेकर जाना चाहते हैं किन्तु उसे बंगला नहीं आती है। मौसा कहते हैं “भक्ति
में भाषा आड़े नहीं आती.”56 किन्तु जब वह दर्शक-दीर्घा से उठकर दान
पेटी में दस रुपये का दान करने जब मंच पर चढ़ता है तो किस प्रकार भक्ति में जाति
आड़े आती है, उसको लेखक ने बखूबी दर्शाने का कार्य किया है “इधर दर्शक-दीर्घा
में जैसे भूचाल आ गया-‘संतराम का कुटुम?...वह कैसे चढ़ गया मंच पर? सारा कुछ अशुद्ध
हो गया ! पकड़ो इसको !”57 सामाजिक विडंबना को आधार बनाकर लिखे जाने
वाले इस उपन्यास की पूर्णता के आधार पर परखना उचित होगा। यह अंश उपन्यास को पढ़ने
के प्रति रोचकता को बढ़ाता है।
बहिष्कृत भारत :- बहिष्कृत भारत के अंतर्गत ‘भटकटैया’ और ‘नागपाश’
नाम की दो आपबीती घटनाओं को जगह दी गयी है। ‘भटकटैया’ में ‘सूअरदान’ के लेखक
रूपनारायण सोनकर अपने उपन्यास की चोरी का आरोप जाने माने फिल्म निर्माता राकेश
रोशन पर लगाते हैं। इस उपन्यास की अनेक घटनाएं, नाम और परिस्थितियों का हु ब हु krrish
3 में मिलना भारतीय सिनेमा को कटघरे में खड़ा करता है। बहरहाल एक निचली जाति का
लेखक होने के कारण उनके उपन्यास को छापने से लेकर, उपन्यास के कथावस्तु की चोरी की
घटना से लेकर न्यायालय तक की लड़ाई को ‘भटकटैया’ में दर्शाया गया है। किन्तु वह
अनभिग्य थे जिस सच्चाई को वह साबित करने के लिए न्याय का दरवाजा खटखटाना चाह रहे
थे, उस पर पहले से ही विशेष जातियों का कब्ज़ा था “न्याय की सर्वोच्च कुर्सी पर
बैठा आदमी हिंदूवादी कर्मकांडों, ढकोसलों, अंधविश्वासों से इतना जकड़ा हुआ है कि वह
‘सूअरदान’ उपन्यास के बारे में ऐसी टिप्पणी कर गया और यहां तक कि उपन्यास का यह
शीर्षक नहीं होना चाहिए.”58 उन्होंने पहली बार जाना कि न्यायलय वह
जगह है जहाँ झूठ को सच और सच को झूठ में बदलने के केवल पैसे वसूले जाते थे। बड़े से
बड़े अपराधी को केवल पैसे के आधार पर छुड़वाया जा सकता था और गरीब से गरीब व्यक्ति
को न्याय के भरोसे सालों जूते घिसवाया जा सकता था। दूसरी आपबीती ‘नागपाश’ राजकुमारी
की है जो दलित समाज की स्त्री होने और पारिवारिक कष्टों को झेलते हुए
विद्यावाचस्पति की उपाधि हासिल करने में कामयाब होती हैं। किन्तु जब अपने शोधकार्य
को पुस्तक आकार में प्रकाशक को देती हैं तो वह उस पुस्तक का पेपर तय किए गये पेपर
की तुलना में पतला करके उनके साथ छल करता है। बची हुई प्रतियों में वह पतले पृष्ठ
को सुधारने की बात स्वीकार भी लेता है किन्तु जब उनके पति फोन पर उसकी बात सुनते
हैं तो दोनों के होश खो जाते हैं “अरे भाई, एक मैडम की किताब प्रकाशन में आई
है. कुछ प्रतियां दे दीं, कुछ बची हैं. कोटे से कॉलेज में लगी हुई हैं. दस-बारह
छाप भी दी बाकी पड़ी हैं छपेंगी. बताओ, आरक्षण से नौकरी पा लोग जाति भूल जाते हैं.”59
ऐसा एक नहीं बल्कि जाति को लेकर दो बार उनको शर्मिंदा होना पड़ता है। उक्त दोनों ही
अनुभव वर्तमान समाज की काली सच्चाई को अभिव्यक्त करते हैं।
सम्पादकीय:- सम्पादकीय ‘भारतीय समाज और दलित मध्यवर्ग’ में
संपादक ने दलित साहित्य के नेपथ्य की उस वास्तविकता से अवगत कराने का प्रयास किया
है जो किसी भी समाज की ताकत होती है अर्थात मध्यवर्ग। सम्पादकीय में जितनी गंभीरता
से उन्होंने दलित समाज और साहित्य की पृष्ठभूमि को उजागर किया है वह सम्पादक की
दृष्टि और अनुभव को दर्शाता है। वह सम्पादकीय में लिखते हैं “हमें यह नहीं
भूलना चाहिए कि किसी भी देश अथवा समुदाय का मध्यवर्ग ही विचारक, बुद्धिजीवी और
जननायक देता है. इतिहास में अपवादों को अगर छोड़ दिया जाए तो अधिकांश वैज्ञानिक,
डॉक्टर, इंजीनियर, शिक्षक, धर्मवेत्ता, विधिवेत्ता, विचारक और दार्शनिक, मध्यवर्ग
से ही आए हैं. इसी वर्ग ने दलित साहित्य का सृजन किया और दलित आन्दोलन को दिशा दी.”60
किसी पत्रिका का विशेषांक कब एक अच्छा विशेषांक कहलाता है? जब इस प्रश्न पर विचार
किया जायेगा तो हंस के दलित विशेषांक को जरूर याद किया जायेगा। दलित विशेषांक ने अपनी
सृजनात्मकता से जातिगत शोषण को नकारता है और समाज की एक नई तासीर निर्मित करने पर
जोर देता है। जिसे समतामूलक समाज के रूप में देखा जा सकता है। अंततः इस बात को
कहने में कोई हर्ज नहीं है कि दलित साहित्य ने मुख्यधारा के साहित्यकारों की
उन्नयन देखती दृष्टि को अवनमन देखने पर मजबूर किया है।
सन्दर्भ सूची
1.
सं. नावरिया, अजय, हंस (दलित साहित्य), नवंबर 2019, अक्षर प्रकाशन, पृष्ठ
संख्या-10
2.
वही, पृष्ठ संख्या-11
3.
वही, पृष्ठ संख्या-10
4.
वही, पृष्ठ संख्या-22
5.
वही, पृष्ठ संख्या-33
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8.
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9.
वही, पृष्ठ संख्या-45
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11. वही, पृष्ठ संख्या-11
12. वही, पृष्ठ संख्या-20
13. वही, पृष्ठ संख्या-29
14. वही, पृष्ठ संख्या-31
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17. वही, पृष्ठ संख्या-49
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21. वही, पृष्ठ संख्या-57
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25. वही, पृष्ठ संख्या-63
26. वही, पृष्ठ संख्या-63
27. वही, पृष्ठ संख्या-64
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30. वही, पृष्ठ संख्या-68
31. वही, पृष्ठ संख्या-69
32. वही, पृष्ठ संख्या-71
33. वही, पृष्ठ संख्या-72
34. वही, पृष्ठ संख्या-113
35. वही, पृष्ठ संख्या-113
36. वही, पृष्ठ संख्या-106
37. वही, पृष्ठ संख्या-75
38. वही, पृष्ठ संख्या-76
39. वही, पृष्ठ संख्या-76
40. वही, पृष्ठ संख्या-80
41. वही, पृष्ठ संख्या-80
42. वही, पृष्ठ संख्या-81
43. वही, पृष्ठ संख्या-83
44. वही, पृष्ठ संख्या-85
45. वही, पृष्ठ संख्या-87
46. वही, पृष्ठ संख्या-86
47. वही, पृष्ठ संख्या-90
48. वही, पृष्ठ संख्या-90
49. वही, पृष्ठ संख्या-90
50. वही, पृष्ठ संख्या-90
51. वही, पृष्ठ संख्या-97
52. वही, पृष्ठ संख्या-97
53. वही, पृष्ठ संख्या-107
54. वही, पृष्ठ संख्या-100
55. वही, पृष्ठ संख्या-100
56. वही, पृष्ठ संख्या-114
57. वही, पृष्ठ संख्या-117
58. वही, पृष्ठ संख्या-124
59. वही, पृष्ठ संख्या-128
60. वही, पृष्ठ संख्या-5

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